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mahabharat 5.130.35: वह कार्य पुण्यात्माओं द्वारा सदा निन्दित है। वह न केवल निन्दनीय है, अपितु तुम भी उसे नहीं कर सकते; परन्तु तुम्हारे समान कलंकित और मूर्ख व्यक्ति उसे करने का प्रयत्न करता है॥ 35॥   |   mahabharat अध्याय 5.130: दुर्योधनके षड्यन्त्रका सात्यकिद्वारा भंडाफोड़, श्रीकृष्णकी सिंहगर्जना तथा धृतराष्ट्र और विदुरका दुर्योधनको पुन: समझाना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 130: दुर्योधनके षड्यन्त्रका सात्यकिद्वारा भंडाफोड़, श्रीकृष्णकी सिंहगर्जना तथा धृतराष्ट्र और विदुरका दुर्योधनको पुन: समझाना  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  5.130.35 
अशक्यमयशस्यं च सद्भिश्चापि विगर्हितम्।
यथा त्वादृशको मूढो व्यवस्येत् कुलपांसन:॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
वह कार्य पुण्यात्माओं द्वारा सदा निन्दित है। वह न केवल निन्दनीय है, अपितु तुम भी उसे नहीं कर सकते; परन्तु तुम्हारे समान कलंकित और मूर्ख व्यक्ति उसे करने का प्रयत्न करता है॥ 35॥
 
‘That is an act which has always been condemned by the virtuous. It is not only infamous, you cannot even do it; but a disgraced and foolish person like you tries to do it.॥ 35॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)