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श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 130: दुर्योधनके षड्यन्त्रका सात्यकिद्वारा भंडाफोड़, श्रीकृष्णकी सिंहगर्जना तथा धृतराष्ट्र और विदुरका दुर्योधनको पुन: समझाना  »  श्लोक 28-29h
 
 
श्लोक  5.130.28-29h 
इदं तु न प्रवर्तेयं निन्दितं कर्म भारत॥ २८॥
संनिधौ ते महाराज क्रोधजं पापबुद्धिजम्।
 
 
अनुवाद
"किन्तु भरत! महाराज! मैं क्रोध या पाप-विचार से किया गया यह निंदनीय कार्य आपके समक्ष नहीं करूँगा। 28 1/2।
 
"But, Bharata! Maharaj! I will not start this condemnable act done out of anger or sinful thoughts in your presence. 28 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)