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mahabharat 5.130.22-23h: परन्तु ये भगवान श्रीकृष्ण न तो कोई पापकर्म कर सकते हैं, न ही कभी धर्म से विचलित हो सकते हैं॥ 22 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 5.130: दुर्योधनके षड्यन्त्रका सात्यकिद्वारा भंडाफोड़, श्रीकृष्णकी सिंहगर्जना तथा धृतराष्ट्र और विदुरका दुर्योधनको पुन: समझाना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 130: दुर्योधनके षड्यन्त्रका सात्यकिद्वारा भंडाफोड़, श्रीकृष्णकी सिंहगर्जना तथा धृतराष्ट्र और विदुरका दुर्योधनको पुन: समझाना  »  श्लोक 22-23h
 
 
श्लोक  5.130.22-23h 
न त्वयं निन्दितं कर्म कुर्यात् पापं कथंचन॥ २२॥
न च धर्मादपक्रामेदच्युत: पुरुषोत्तम:।
 
 
अनुवाद
परन्तु ये भगवान श्रीकृष्ण न तो कोई पापकर्म कर सकते हैं, न ही कभी धर्म से विचलित हो सकते हैं॥ 22 1/2॥
 
‘But this Supreme Personality of Godhead Sri Krishna cannot commit any sinful or condemnable act, nor can he ever deviate from Dharma.॥ 22 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)