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mahabharat 5.13.25: उत्तरायण के दिन आने वाली पवित्र एवं दिव्य रात्रि की अधिष्ठात्री देवी रात्रि को मैं प्रणाम करता हूँ। मेरी मनोकामना पूर्ण हो।’ ॥25॥   |   mahabharat अध्याय 5.13: नहुषका इन्द्राणीको कुछ कालकी अवधि देना, इन्द्रका ब्रह्महत्यासे उद्धार तथा शचीद्वारा रात्रिदेवीकी उपासना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 13: नहुषका इन्द्राणीको कुछ कालकी अवधि देना, इन्द्रका ब्रह्महत्यासे उद्धार तथा शचीद्वारा रात्रिदेवीकी उपासना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  5.13.25 
पुण्यां चेमामहं दिव्यां प्रवृत्तामुत्तरायणे।
देवीं रात्रिं नमस्यामि सिध्यतां मे मनोरथ:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
उत्तरायण के दिन आने वाली पवित्र एवं दिव्य रात्रि की अधिष्ठात्री देवी रात्रि को मैं प्रणाम करता हूँ। मेरी मनोकामना पूर्ण हो।’ ॥25॥
 
I bow to the presiding goddess Ratri, the holy and divine night that is coming on the day of Uttarayan. May my desire be fulfilled.' ॥25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)