श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 13: नहुषका इन्द्राणीको कुछ कालकी अवधि देना, इन्द्रका ब्रह्महत्यासे उद्धार तथा शचीद्वारा रात्रिदेवीकी उपासना  »  श्लोक 2-4
 
 
श्लोक  5.13.2-4 
एवमुक्ता तु सा देवी नहुषेण पतिव्रता॥ २॥
प्रावेपत भयोद्विग्ना प्रवाते कदली यथा।
प्रणम्य सा हि ब्रह्माणं शिरसा तु कृताञ्जलि:॥ ३॥
देवराजमथोवाच नहुषं घोरदर्शनम्।
कालमिच्छाम्यहं लब्धुं त्वत्त: कंचित् सुरेश्वर॥ ४॥
 
 
अनुवाद
नहुष के ऐसा कहने पर पतिव्रता स्त्री शची भयभीत होकर प्रचण्ड वायु से हिलते हुए केले के वृक्ष के समान काँपने लगी। उसने सिर झुकाकर ब्रह्माजी को प्रणाम किया और हाथ जोड़कर भयंकर रूप वाले देवराज नहुष से कहा - 'देवेश्वर! मैं आपसे कुछ समय लेना चाहती हूँ।॥ 2-4॥
 
When Nahush said this, the devoted wife Shachi became frightened and started trembling like a banana tree swaying in a strong wind. She bowed her head and saluted Lord Brahma and with folded hands said to the fierce looking Devaraj Nahush - 'Deveshwar! I want to take some time from you.॥ 2-4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)