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mahabharat 5.129.40: ‘पिताजी! युद्ध करने से कोई लाभ नहीं है। उससे धर्म और अर्थ की प्राप्ति नहीं होती, फिर सुख कैसे मिलेगा? युद्ध में सदैव विजय होगी, यह निश्चित नहीं है; अतः उसमें मन न लगाओ॥40॥   |   mahabharat अध्याय 5.129: धृतराष्ट्रका गान्धारीको बुलाना और उसका दुर्योधनको समझाना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 129: धृतराष्ट्रका गान्धारीको बुलाना और उसका दुर्योधनको समझाना  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  5.129.40 
न युद्धे तात कल्याणं न धर्मार्थौ कुत: सुखम्।
न चापि विजयो नित्यं मा युद्धे चेत आधिथा:॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
‘पिताजी! युद्ध करने से कोई लाभ नहीं है। उससे धर्म और अर्थ की प्राप्ति नहीं होती, फिर सुख कैसे मिलेगा? युद्ध में सदैव विजय होगी, यह निश्चित नहीं है; अतः उसमें मन न लगाओ॥40॥
 
‘Father! There is no good in fighting a war. One cannot achieve Dharma and Artha from it, then how can one get happiness? It is not certain that one will always be victorious in a war; hence do not put your mind to it.॥ 40॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)