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श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 125: भीष्म, द्रोण, विदुर और धृतराष्ट्रका दुर्योधनको समझाना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  5.125.2 
कृष्णेन वाक्यमुक्तोऽसि सुहृदां शममिच्छता।
अन्वपद्यस्व तत् तात मा मन्युवशमन्वगा:॥ २॥
 
 
अनुवाद
तत्! मित्रों में परस्पर शांति बनाए रखने की इच्छा से भगवान श्रीकृष्ण ने जो कहा है, उसे स्वीकार करो। क्रोध के वशीभूत मत होओ।'
 
‘Tat! Please accept what Lord Krishna has said with a desire to maintain mutual peace among friends. Don't be influenced by anger. 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)