श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 125: भीष्म, द्रोण, विदुर और धृतराष्ट्रका दुर्योधनको समझाना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  5.125.18 
वैशम्पायन उवाच
तस्मिन् वाक्यान्तरे वाक्यं क्षत्तापि विदुरोऽब्रवीत्।
दुर्योधनमभिप्रेक्ष्य धार्तराष्ट्रममर्षणम्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं- जनमेजय, जब द्रोणाचार्य बोल रहे थे तो क्रोध से भरे हुए विदुरजी ने धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन की ओर देखकर उन्हें टोकते हुए कहा- ॥18॥
 
Vaishmpayana says: Janamejaya, when Dronacharya was speaking, Vidurji, filled with resentment, looking at Duryodhana, son of Dhritarashtra, interrupted him and said: ॥18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)