श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 125: भीष्म, द्रोण, विदुर और धृतराष्ट्रका दुर्योधनको समझाना  »  श्लोक 16-17
 
 
श्लोक  5.125.16-17 
यथोक्तं जामदग्न्येन भूयानेष ततोऽर्जुन:।
कृष्णो हि देवकीपुत्रो देवैरपि सुदु:सह:।
किं ते सुखप्रियेणेह प्रोक्तेन भरतर्षभ॥ १६॥
एतत् ते सर्वमाख्यातं यथेच्छसि तथा कुरु।
न हि त्वामुत्सहे वक्तुं भूयो भरतसत्तम॥ १७॥
 
 
अनुवाद
‘जमदग्निपुत्र परशुरामजी ने अर्जुन को जो बताया है, उससे भी महान् अर्जुन हैं और देवकीपुत्र भगवान श्रीकृष्ण देवताओं के लिए भी अत्यन्त असह्य हैं। हे भरतश्रेष्ठ! आपको जो प्रिय और प्रिय लगता है, उसे और अधिक कहने से क्या लाभ? मुझे जो कुछ कहना था, वह सब कह दिया। अब आप जैसा चाहें वैसा करें। हे भरतवंशी रत्न! अब आपसे और कुछ कहने का मेरे मन में कोई उत्साह नहीं है।’॥16-17॥
 
‘Arjun is even greater than what Parashurama, son of Jamadagni, has described him to be and Lord Krishna, son of Devaki, is extremely unbearable even for the gods. O best of the Bharatas! What is the use of telling you more things that you find pleasant and pleasing? I have said all the things that I had to say. Now do as you please. O jewel of the Bharata dynasty! Now I have no enthusiasm in my mind to say anything more to you.’॥ 16-17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)