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श्लोक 5.124.62  |
पाण्डवै: संशमं कृत्वा कृत्वा च सुहृदां वच:।
सम्प्रीयमाणो मित्रैश्च चिरं भद्राण्यवाप्स्यसि॥ ६२॥ |
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| अनुवाद |
| “पाण्डवों के साथ संधि करके, अपने हितैषी मित्रों की बातें सुनकर तथा अपने मित्रों के साथ सुखपूर्वक रहकर तुम दीर्घकाल तक कल्याण के भागी बने रहोगे।” ॥62॥ |
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| "By entering into an agreement with the Pandavas, by listening to the words of your well-wishing friends and living happily with your friends, you will remain a sharer of welfare for a long time." ॥ 62॥ |
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इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि भगवद्वाक्ये चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १२४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें भगवद्वाक्यसम्बन्धी एक सौ चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १२४॥
[दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर कुल ६२ १/२ श्लोक हैं।] |
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