श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 124: धृतराष्ट्रके अनुरोधसे भगवान‍् श्रीकृष्णका दुर्योधनको समझाना  »  श्लोक 45-46h
 
 
श्लोक  5.124.45-46h 
दु:शासने दुर्विषहे कर्णे चापि ससौबले॥ ४५॥
एतेष्वैश्वर्यमाधाय भूतिमिच्छसि भारत।
 
 
अनुवाद
भरत! क्या तुम अपने धन का भार दुःशासन, दुर्विषाह, कर्ण और शकुनि पर रखकर समृद्ध होना चाहते हो?॥ 45 1/2॥
 
Bharata! Do you wish to prosper by placing the burden of your wealth on Dushasan, Durvishah, Karna and Shakuni?॥ 45 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)