vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री महाभारत
»
पर्व 5: उद्योग पर्व
»
अध्याय 124: धृतराष्ट्रके अनुरोधसे भगवान् श्रीकृष्णका दुर्योधनको समझाना
»
श्लोक 45-46h
श्लोक
5.124.45-46h
दु:शासने दुर्विषहे कर्णे चापि ससौबले॥ ४५॥
एतेष्वैश्वर्यमाधाय भूतिमिच्छसि भारत।
अनुवाद
भरत! क्या तुम अपने धन का भार दुःशासन, दुर्विषाह, कर्ण और शकुनि पर रखकर समृद्ध होना चाहते हो?॥ 45 1/2॥
Bharata! Do you wish to prosper by placing the burden of your wealth on Dushasan, Durvishah, Karna and Shakuni?॥ 45 1/2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×