श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 124: धृतराष्ट्रके अनुरोधसे भगवान‍् श्रीकृष्णका दुर्योधनको समझाना  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  5.124.33 
त्वयापि प्रतिपत्तव्यं तथैव भरतर्षभ।
स्वेषु बन्धुषु मुख्येषु मा मन्युवशमन्वगा:॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
भरतश्रेष्ठ! तुम्हें भी अपने उन महान मित्रों के प्रति वैसा ही व्यवहार करना चाहिए। तुम्हें क्रोध के वशीभूत नहीं होना चाहिए। 33॥
 
‘Bharatshrestha! You too should behave in the same way towards those great friends of yours. You should not be influenced by anger. 33॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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