श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 124: धृतराष्ट्रके अनुरोधसे भगवान‍् श्रीकृष्णका दुर्योधनको समझाना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  5.124.25 
योऽर्थकामस्य वचनं प्रातिकूल्यान्न मृष्यते।
शृणोति प्रतिकूलानि द्विषतां वशमेति स:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
जो अपने हित चाहने वाले मित्रों की बातों को सहन नहीं करता, क्योंकि वे उसकी इच्छा के विरुद्ध हैं और जो अपने विरुद्ध कहे गए उन वचनों को ही सुनता है, जो उसके मित्र नहीं हैं, वह शत्रुओं के अधीन हो जाता है॥ 25॥
 
He who does not tolerate the words of his friends who seek his own welfare because they are against his will and who listens only to those words spoken against him by those who are not his friends, becomes subject to the enemies.॥ 25॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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