श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 124: धृतराष्ट्रके अनुरोधसे भगवान‍् श्रीकृष्णका दुर्योधनको समझाना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  5.124.22 
श्रुत्वा य: सुहृदां शास्त्रं मर्त्यो न प्रतिपद्यते।
विपाकान्ते दहत्येनं किम्पाकमिव भक्षितम्॥ २२॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य अपने मित्रों द्वारा शास्त्रविधि से दी गई सलाह को सुनकर भी उसे स्वीकार नहीं करता, उसका अस्वीकार अन्त में उसे उसी प्रकार दुःख से जलाता है, जैसे खाया हुआ इन्द्रायण फल पाचन के अन्त में जलन उत्पन्न करता है॥ 22॥
 
A person who, even after hearing the advice given by his friends in accordance with the scriptures, does not accept it, his rejection ultimately burns him with grief in the same way as the eaten Indrayan fruit causes burning sensation at the end of digestion.॥ 22॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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