श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 124: धृतराष्ट्रके अनुरोधसे भगवान‍् श्रीकृष्णका दुर्योधनको समझाना  »  श्लोक 16-18
 
 
श्लोक  5.124.16-18 
तद्धितं च प्रियं चैव धृतराष्ट्रस्य धीमत:॥ १६॥
पितामहस्य द्रोणस्य विदुरस्य महामते:।
कृपस्य सोमदत्तस्य बाह्लीकस्य च धीमत:॥ १७॥
अश्वत्थाम्नो विकर्णस्य संजयस्य विविंशते:।
ज्ञातीनां चैव भूयिष्ठं मित्राणां च परंतप॥ १८॥
 
 
अनुवाद
परम बुद्धिमान राजा धृतराष्ट्र को भी यह प्रिय और हितकर प्रतीत होता है। परंतप! यह पितामह भीष्म, आचार्य द्रोण, महामती विदुर, कृपाचार्य, सोमदत्त, बुद्धिमान बाह्लिक, अश्वत्थामा, विकर्ण, संजय, विविंशति तथा अन्य रिश्तेदारों और मित्रों को अधिक प्रिय है। 16-18
 
This also seems to be dear and beneficial to the most intelligent king Dhritarashtra. Parantap! This is more dear to grandfather Bhishma, Acharya Drona, Mahamati Vidur, Kripacharya, Somdutt, intelligent Bahlika, Ashwatthama, Vikarna, Sanjay, Vivinshati and other relatives and friends. 16-18
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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