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श्लोक 5.124.1  |
धृतराष्ट्र उवाच
भगवन्नेवमेवैतद् यथा वदसि नारद।
इच्छामि चाहमप्येवं न त्वीशो भगवन्नहम्॥ १॥ |
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| अनुवाद |
| धृतराष्ट्र बोले - हे नारद! आप जो कह रहे हैं, वह ठीक है। मैं भी यही चाहता हूँ; परन्तु इस पर मेरा कोई वश नहीं है॥1॥ |
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| Dhritarashtra said - O Lord Narada! What you are saying is right. I also want the same; but I have no control over it.॥ 1॥ |
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