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mahabharat 5.123.10: ‘अब तुमने अपने (दौहित्रों द्वारा प्राप्त) कर्मों से निवास करके अचल, सनातन, पुण्यमय, उत्तम, स्थिर और अविनाशी स्थान प्राप्त कर लिया है’॥10॥   |   mahabharat अध्याय 5.123:   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 123:  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  5.123.10 
स्थानं च प्रतिपन्नोऽसि कर्मणा स्वेन निर्जितम्।
अचलं शाश्वतं पुण्यमुत्तमं ध्रुवमव्ययम्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
‘अब तुमने अपने (दौहित्रों द्वारा प्राप्त) कर्मों से निवास करके अचल, सनातन, पुण्यमय, उत्तम, स्थिर और अविनाशी स्थान प्राप्त कर लिया है’॥10॥
 
‘Now you have attained an unshakable, eternal, virtuous, noble, stable and imperishable place by living through your deeds (acquired by the Dauhitaras)’. 10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)