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mahabharat 5.122.6-7: तत्पश्चात् क्षत्रियों के प्रधान प्रतर्दन ने कहा, 'मैं जिस प्रकार सदैव धर्म में रत रहा हूँ, उसी प्रकार मैं सदैव न्यायपूर्ण युद्ध में संलग्न रहा हूँ, तथा क्षत्रिय वंश के अनुसार संसार में मैंने जो यश अर्जित किया है, वह 'वीर' शब्द के योग्य है, आपको वह प्राप्त हो।'   |   mahabharat अध्याय 5.122: सत्संग एवं दौहित्रोंके पुण्यदानसे ययातिका पुन: स्वर्गारोहण   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 122: सत्संग एवं दौहित्रोंके पुण्यदानसे ययातिका पुन: स्वर्गारोहण  »  श्लोक 6-7
 
 
श्लोक  5.122.6-7 
तत: प्रतर्दनोऽप्याह वाक्यं क्षत्रियपुङ्गव:।
यथा धर्मरतिर्नित्यं नित्यं युद्धपरायण:॥ ६॥
प्राप्तवानस्मि यल्लोके क्षत्रवंशोद्भवं यश:।
वीरशब्दफलं चैव तेन संयुज्यतां भवान्॥ ७॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् क्षत्रियों के प्रधान प्रतर्दन ने कहा, 'मैं जिस प्रकार सदैव धर्म में रत रहा हूँ, उसी प्रकार मैं सदैव न्यायपूर्ण युद्ध में संलग्न रहा हूँ, तथा क्षत्रिय वंश के अनुसार संसार में मैंने जो यश अर्जित किया है, वह 'वीर' शब्द के योग्य है, आपको वह प्राप्त हो।'
 
Thereafter, the chief of the Kshatriyas, Pratardana, said, 'Just as I have always been devoted to Dharma, I have always been involved in a just war, and I have earned fame in the world in accordance with the Kshatriya lineage and the merits worthy of the word 'Veer', may you be blessed with that.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)