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mahabharat 5.122.4: संसार में समस्त जातियों की निन्दा से दूर रहकर मैंने जो पुण्य अर्जित किया है, वह भी मैं तुम्हें दे रहा हूँ। तुम्हें उस पुण्य का आशीर्वाद प्राप्त हो॥4॥   |   mahabharat अध्याय 5.122: सत्संग एवं दौहित्रोंके पुण्यदानसे ययातिका पुन: स्वर्गारोहण   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 122: सत्संग एवं दौहित्रोंके पुण्यदानसे ययातिका पुन: स्वर्गारोहण  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  5.122.4 
प्राप्तवानस्मि यल्लोके सर्ववर्णेष्वगर्हया।
तदप्यथ च दास्यामि तेन संयुज्यतां भवान्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
संसार में समस्त जातियों की निन्दा से दूर रहकर मैंने जो पुण्य अर्जित किया है, वह भी मैं तुम्हें दे रहा हूँ। तुम्हें उस पुण्य का आशीर्वाद प्राप्त हो॥4॥
 
I am also giving you the merits that I have earned by staying away from criticising all castes in the world. May you be blessed with that merit.॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)