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mahabharat 5.122.1-2: नारद जी कहते हैं- उन महापुरुषों द्वारा पहचाने जाने पर, पुरुषोत्तम राजा ययाति बिना पृथ्वी को स्पर्श किए ऊपर की ओर उठने लगे। उस समय उनका रूप दिव्य हो गया था। वे शोक और चिंता से मुक्त थे। उन्होंने दिव्य हार और दिव्य वस्त्र धारण किए हुए थे। दिव्य आभूषण उनके शरीर की शोभा बढ़ा रहे थे और वे दिव्य सुगंध से महक रहे थे। वे अपने पैरों से पृथ्वी को स्पर्श नहीं कर रहे थे। 1-2।   |   mahabharat अध्याय 5.122: सत्संग एवं दौहित्रोंके पुण्यदानसे ययातिका पुन: स्वर्गारोहण   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 122: सत्संग एवं दौहित्रोंके पुण्यदानसे ययातिका पुन: स्वर्गारोहण  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  5.122.1-2 
नारद उवाच
प्रत्यभिज्ञातमात्रोऽथ सद्भिस्तैर्नरपुङ्गव:।
समारुरोह नृपतिरस्पृशन् वसुधातलम्।
ययातिर्दिव्यसंस्थानो बभूव विगतज्वर:॥ १॥
दिव्यमाल्याम्बरधरो दिव्याभरणभूषित:।
दिव्यगन्धगुणोपेतो न पृथ्वीमस्पृशत् पदा॥ २॥
 
 
अनुवाद
नारद जी कहते हैं- उन महापुरुषों द्वारा पहचाने जाने पर, पुरुषोत्तम राजा ययाति बिना पृथ्वी को स्पर्श किए ऊपर की ओर उठने लगे। उस समय उनका रूप दिव्य हो गया था। वे शोक और चिंता से मुक्त थे। उन्होंने दिव्य हार और दिव्य वस्त्र धारण किए हुए थे। दिव्य आभूषण उनके शरीर की शोभा बढ़ा रहे थे और वे दिव्य सुगंध से महक रहे थे। वे अपने पैरों से पृथ्वी को स्पर्श नहीं कर रहे थे। 1-2।
 
Narada says- Just on being recognized by those noble men, the best of men, King Yayati started rising upwards without touching the earth. At that time his form had become divine. He was free from grief and worry. He was wearing divine necklace and divine clothes. Divine ornaments were enhancing the beauty of his body and he was smelling of divine fragrance. He was not touching the earth with his feet. 1-2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)