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mahabharat 5.121.19: ययाति बोले - मैं ब्राह्मण नहीं हूँ, जिसका धन केवल दान है। मैं क्षत्रिय हूँ। अतः मेरी बुद्धि दूसरों के पुण्यों को नष्ट करने (उन्हें ग्रहण करने) में प्रवृत्त नहीं होती।॥19॥   |   mahabharat अध्याय 5.121: ययातिका स्वर्गलोकसे पतन और उनके दौहित्रों, पुत्री तथा गालव मुनिका उन्हें पुन: स्वर्गलोकमें पहुँचानेके लिये अपना-अपना पुण्य देनेके लिये उद्यत होना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 121: ययातिका स्वर्गलोकसे पतन और उनके दौहित्रों, पुत्री तथा गालव मुनिका उन्हें पुन: स्वर्गलोकमें पहुँचानेके लिये अपना-अपना पुण्य देनेके लिये उद्यत होना  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  5.121.19 
ययातिरुवाच
नाहं प्रतिग्रहधनो ब्राह्मण: क्षत्रियो ह्यहम्।
न च मे प्रवणा बुद्धि: परपुण्यविनाशने॥ १९॥
 
 
अनुवाद
ययाति बोले - मैं ब्राह्मण नहीं हूँ, जिसका धन केवल दान है। मैं क्षत्रिय हूँ। अतः मेरी बुद्धि दूसरों के पुण्यों को नष्ट करने (उन्हें ग्रहण करने) में प्रवृत्त नहीं होती।॥19॥
 
Yayati said - I am not a Brahmin whose wealth is only gifts. I am a Kshatriya. Hence my intellect is not inclined to destroy the merits of others (by accepting them).॥ 19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)