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mahabharat 5.121.12-13: पृथ्वी से स्वर्ग की ओर धुएँ की एक नदी बह रही थी, मानो आकाश गंगा पृथ्वी की ओर जा रही हो। उस धुएँ का सहारा लेकर, राजाओं के राजा ययाति, जो संसार के राजाओं के समान तेजस्वी और स्नान करके पवित्र हो गए थे, अपने चारों स्वजनों के बीच गिर पड़े।   |   mahabharat अध्याय 5.121: ययातिका स्वर्गलोकसे पतन और उनके दौहित्रों, पुत्री तथा गालव मुनिका उन्हें पुन: स्वर्गलोकमें पहुँचानेके लिये अपना-अपना पुण्य देनेके लिये उद्यत होना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 121: ययातिका स्वर्गलोकसे पतन और उनके दौहित्रों, पुत्री तथा गालव मुनिका उन्हें पुन: स्वर्गलोकमें पहुँचानेके लिये अपना-अपना पुण्य देनेके लिये उद्यत होना  »  श्लोक 12-13
 
 
श्लोक  5.121.12-13 
भूमौ स्वर्गे च सम्बद्धां नदीं धूममयीमिव।
गङ्गां गामिव गच्छन्तीमालम्ब्य जगतीपति:॥ १२॥
श्रीमत्स्ववभृथाग्रॺेषु चतुर्षु प्रतिबन्धुषु।
मध्ये निपतितो राजा लोकपालोपमेषु स:॥ १३॥
 
 
अनुवाद
पृथ्वी से स्वर्ग की ओर धुएँ की एक नदी बह रही थी, मानो आकाश गंगा पृथ्वी की ओर जा रही हो। उस धुएँ का सहारा लेकर, राजाओं के राजा ययाति, जो संसार के राजाओं के समान तेजस्वी और स्नान करके पवित्र हो गए थे, अपने चारों स्वजनों के बीच गिर पड़े।
 
A river of smoke was flowing from the earth to the heaven, as if the Milky Way was going to the earth. King of the kings, Yayati, taking support of that smoke, fell in the midst of his four relatives, radiant like the kings of the world and pure after taking the bath.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)