श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 12: देवता-नहुष-संवाद, बृहस्पतिके द्वारा इन्द्राणीकी रक्षा तथा इन्द्राणीका नहुषके पास कुछ समयकी अवधि माँगनेके लिये जाना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  5.12.20 
मोघमन्नं विन्दति चाप्यचेता:
स्वर्गाल्लोकाद् भ्रश्यति नष्टचेष्ट:।
भीतं प्रपन्नं प्रददाति यो वै
न तस्य हव्यं प्रतिगृह्णन्ति देवा:॥ २०॥
 
 
अनुवाद
जो दुर्बल बुद्धि वाला मनुष्य भयभीत शरणागत को शत्रु के हवाले कर देता है, उसका भोजन व्यर्थ हो जाता है। उसके सारे प्रयत्न नष्ट हो जाते हैं और वह स्वर्ग से नीचे गिर जाता है। इतना ही नहीं, देवता भी उसके द्वारा अर्पित भोजन को स्वीकार नहीं करते॥20॥
 
‘The food that the weak-minded man who hands over a frightened refugee to the enemy, eats goes in vain. All his endeavors are ruined and he falls down from the heaven. Not only this, the gods do not accept the food offered by him.॥ 20॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)