श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 12: देवता-नहुष-संवाद, बृहस्पतिके द्वारा इन्द्राणीकी रक्षा तथा इन्द्राणीका नहुषके पास कुछ समयकी अवधि माँगनेके लिये जाना  »  श्लोक 17-18
 
 
श्लोक  5.12.17-18 
नाकार्यं कर्तुमिच्छामि ब्राह्मण: सन् विशेषत:।
श्रुतधर्मा सत्यशीलो जानन् धर्मानुशासनम्॥ १७॥
नाहमेतत् करिष्यामि गच्छध्वं वै सुरोत्तमा:।
अस्मिंश्चार्थे पुरा गीतं ब्रह्मणा श्रूयतामिदम्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
विशेषकर ब्राह्मण होकर भी मैं यह अवांछनीय कार्य नहीं कर सकता। मैंने धर्म के वचन सुने हैं और सत्य को स्वभाव में धारण किया है। मैं शास्त्रों में वर्णित धर्म को भी जानता हूँ, अतः मैं यह पापकर्म नहीं करूँगा। हे देवश्रेष्ठ! आप सब लोग लौट जाएँ। ब्रह्माजी ने पूर्वकाल में इस विषय में जो गान गाया था, वह इस प्रकार है, कृपया सुनें॥17-18॥
 
Especially being a Brahmin, I cannot do this undesirable act. I have heard the words of Dharma and have imbibed the truth in my nature. I also know the Dharma preached in the scriptures; hence I will not commit this sinful act! O best of the gods! You all should return. The song which Brahmaji had sung in the past on this subject is as follows, please listen.॥17-18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)