श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 116: हर्यश्वका दो सौ श्यामकर्ण घोड़े देकर ययातिकन्याके गर्भसे वसुमना नामक पुत्र उत्पन्न करना और गालवका इस कन्याके साथ वहाँसे प्रस्थान  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  5.116.1-2 
नारद उवाच
हर्यश्वस्त्वब्रवीद् राजा विचिन्त्य बहुधा तत:।
दीर्घमुष्णं च नि:श्वस्य प्रजाहेतोर्नृपोत्तम:॥ १॥
उन्नतेषून्नता षट्सु सूक्ष्मा सूक्ष्मेषु पञ्चसु।
गम्भीरा त्रिषु गम्भीरेष्वियं रक्ता च पञ्चसु॥ २॥
 
 
अनुवाद
नारदजी कहते हैं - तत्पश्चात नृपतिश्रेष्ठ राजा हर्यश्व ने उस कन्या के विषय में बहुत विचार करके गहरी साँस ली और संतान प्राप्ति की इच्छा से ऋषि से कहा - 'द्विजश्रेष्ठ! इस कन्या के शरीर के जो छह अंग ऊँचे होने चाहिए, वे ऊँचे हैं। जो पाँच अंग सूक्ष्म होने चाहिए, वे सूक्ष्म हैं। जो तीन अंग गंभीर होने चाहिए, वे गंभीर हैं और इसके पाँच अंग रक्त वर्ण के हैं।'
 
Naradji says - After that, King Haryashva, the best of Nripathi, after thinking a lot about that girl, took a deep breath and said to the sage with the desire to have a child - 'Dwijashreshtha! The six body parts of this girl which should be high, are high. The five parts which should be subtle are subtle. Three parts which should be serious are serious and its five parts are of blood colour.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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