दृष्ट्वा प्रियसखं तार्क्ष्यं गालवं च द्विजर्षभम्।
निदर्शनं च तपसो भिक्षां श्लाघ्यां च कीर्तिताम्॥ ३॥
अतीत्य च नृपानन्यानादित्यकुलसम्भवान्।
मत्सकाशमनुप्राप्तावेतां बुद्धिमवेक्ष्य च॥ ४॥
अनुवाद
राजा ने अपने प्रिय मित्र गरुड़जी और तपस्विनी ब्राह्मण गालव को अपने यहाँ उपस्थित देखकर तथा उनके द्वारा कही गई इच्छित भिक्षा सुनकर मन में ऐसा विचार किया - ‘ये दोनों सूर्यवंश में उत्पन्न हुए अन्य अनेक राजाओं को छोड़कर मेरे पास आये हैं।’ ऐसा विचार करके उन्होंने कहा -॥3-4॥
The king, on seeing his dear friend Garuda and the Brahmin Galav, the embodiment of austerity, present at his place and on hearing the desirable alms told by them, thought in his mind like this - 'These two have come to me leaving behind several other kings born in the Suryavansh.' Having thought so, he said -॥ 3-4॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥