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mahabharat 5.115.19: वह धन, वैभव और सेना में सबसे अधिक समृद्ध था । नगर के लोग उससे बहुत प्रेम करते थे । ब्राह्मणों के प्रति उसका बहुत प्रेम था । वह प्रजा का कल्याण चाहता था । उसका मन सांसारिक सुखों से विरक्त और शान्त था । वह घोर तपस्या में लीन था ॥19॥   |   mahabharat अध्याय 5.115: राजा ययातिका गालवको अपनी कन्या देना और गालवका उसे लेकर अयोध्यानरेशके यहाँ जाना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 115: राजा ययातिका गालवको अपनी कन्या देना और गालवका उसे लेकर अयोध्यानरेशके यहाँ जाना  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  5.115.19 
कोशधान्यबलोपेतं प्रियपौरं द्विजप्रियम्।
प्रजाभिकामं शाम्यन्तं कुर्वाणं तप उत्तमम्॥ १९॥
 
 
अनुवाद
वह धन, वैभव और सेना में सबसे अधिक समृद्ध था । नगर के लोग उससे बहुत प्रेम करते थे । ब्राह्मणों के प्रति उसका बहुत प्रेम था । वह प्रजा का कल्याण चाहता था । उसका मन सांसारिक सुखों से विरक्त और शान्त था । वह घोर तपस्या में लीन था ॥19॥
 
He was the most prosperous in treasury, wealth and army. The people of the city loved him very much. He had a lot of love for the Brahmins. He wished for the welfare of the people. His mind was detached from worldly pleasures and was peaceful. He was engaged in great penance.॥19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)