श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 115: राजा ययातिका गालवको अपनी कन्या देना और गालवका उसे लेकर अयोध्यानरेशके यहाँ जाना  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  5.115.1-2 
नारद उवाच
एवमुक्त: सुपर्णेन तथ्यं वचनमुत्तमम्।
विमृश्यावहितो राजा निश्चित्य च पुन: पुन:॥ १॥
यष्टा क्रतुसहस्राणां दाता दानपति: प्रभु:।
ययाति: सर्वकाशीश इदं वचनमब्रवीत्॥ २॥
 
 
अनुवाद
नारदजी कहते हैं - जब गरुड़जी ने यह सत्य और अच्छी बात कही, तब हजारों यज्ञों को करने वाले, दानी, दानशील, प्रभावशाली और राजसी तेज से युक्त समस्त राजाओं के स्वामी महाराज ययाति ने बार-बार विचार करके निश्चय करके यह बात कही॥1-2॥
 
Narada says - When Garuda spoke this truth and good thing, then Maharaja Yayati, the one who performs thousands of yagyas, is a donor, a man of charity, influential and the lord of all kings, who radiates royal radiance, after careful consideration again and again, came to a conclusion and said this. ॥ 1-2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)