श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 113: ऋषभ पर्वतके शिखरपर महर्षि गालव और गरुड़की तपस्विनी शाण्डिलीसे भेंट तथा गरुड़ और गालवका गुरुदक्षिणा चुकानेके विषयमें परस्पर विचार  »  श्लोक 8-9
 
 
श्लोक  5.113.8-9 
सुपर्णोऽथाब्रवीद् विप्रं प्रध्यातं वै मया द्विज।
इमां सिद्धामितो नेतुं तत्र यत्र प्रजापति:॥ ८॥
यत्र देवो महादेवो यत्र विष्णु: सनातन:।
यत्र धर्मश्च यज्ञश्च तत्रेयं निवसेदिति॥ ९॥
 
 
अनुवाद
तब गरुड़जी ने विप्रवर गालव से कहा - 'ब्रह्मन्! मेरे मन में तो यही विचार था कि इस सिद्धतपस्विनी को वहाँ भेज दूँ जहाँ प्रजापति ब्रह्मा हैं, जहाँ महादेवजी हैं, जहाँ सनातन भगवान विष्णु हैं तथा जहाँ धर्म और यज्ञ हैं, वहीं यह निवास करे।'
 
Then Garuda said to Vipravar Galavas – ‘Brahman! I had only this thought in my mind that I should send this Siddhatapaswini to the place where Prajapati Brahma is, where Mahadevji is, where the eternal Lord Vishnu is and where there is religion and yagya, there he should reside. 8-9॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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