श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 113: ऋषभ पर्वतके शिखरपर महर्षि गालव और गरुड़की तपस्विनी शाण्डिलीसे भेंट तथा गरुड़ और गालवका गुरुदक्षिणा चुकानेके विषयमें परस्पर विचार  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  5.113.7 
किं नु ते मनसा ध्यातमशुभं धर्मदूषणम्।
न ह्ययं भवत: स्वल्पो व्यभिचारो भविष्यति॥ ७॥
 
 
अनुवाद
तुम्हारे मन में कौन-से बुरे विचार आए हैं, जो धर्म को भ्रष्ट कर रहे हैं? मैं समझता हूँ, तुमने यहाँ धर्म के विरुद्ध कोई छोटा-मोटा काम नहीं किया होगा।॥7॥
 
What evil thoughts have you had in your mind, which have been corrupting the religion? I think, you must not have committed any small act against religion here.'॥ 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)