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mahabharat 5.113.6: मित्र! यहाँ आने का क्या फल है? हम दोनों को कब तक इसी अवस्था में यहाँ रहना पड़ेगा?॥6॥   |   mahabharat अध्याय 5.113: ऋषभ पर्वतके शिखरपर महर्षि गालव और गरुड़की तपस्विनी शाण्डिलीसे भेंट तथा गरुड़ और गालवका गुरुदक्षिणा चुकानेके विषयमें परस्पर विचार   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 113: ऋषभ पर्वतके शिखरपर महर्षि गालव और गरुड़की तपस्विनी शाण्डिलीसे भेंट तथा गरुड़ और गालवका गुरुदक्षिणा चुकानेके विषयमें परस्पर विचार  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  5.113.6 
किमिदं भवता प्राप्तमिहागमनजं फलम्।
वासोऽयमिह कालं तु कियन्तं नौ भविष्यति॥ ६॥
 
 
अनुवाद
मित्र! यहाँ आने का क्या फल है? हम दोनों को कब तक इसी अवस्था में यहाँ रहना पड़ेगा?॥6॥
 
‘Friend! What is the result of coming here? How long will we both have to stay here in this condition?॥ 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)