श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 113: ऋषभ पर्वतके शिखरपर महर्षि गालव और गरुड़की तपस्विनी शाण्डिलीसे भेंट तथा गरुड़ और गालवका गुरुदक्षिणा चुकानेके विषयमें परस्पर विचार  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  5.113.3 
सिद्धमन्नं तया दत्तं बलिमन्त्रोपबृंहितम्।
भुक्त्वा तृप्तावुभौ भूमौ सुप्तौ तावनुमोहितौ॥ ३॥
 
 
अनुवाद
तपस्वी ने बलिवैश्वदेव से बचा हुआ अभीष्ट सिद्धान्न उन्हें दिया। उसे खाकर वे दोनों तृप्त होकर भूमि पर सो गए। तत्पश्चात निद्रा ने उन्हें अचेत कर दिया। 3॥
 
The ascetic offered him the desired Siddhanna left over from Balivaishvadev. After eating it, both of them became satisfied and slept on the ground. After that sleep made him unconscious. 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)