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श्लोक 5.113.22-23  |
सुपर्णोऽथाब्रवीद् दीनं गालवं भृशदु:खितम्।
प्रत्यक्षं खल्विदानीं मे विश्वामित्रो यदुक्तवान्॥ २२॥
तदागच्छ द्विजश्रेष्ठ मन्त्रयिष्याव गालव।
नादत्त्वा गुरवे शक्यं कृत्स्नमर्थं त्वयाऽऽसितुम्॥ २३॥ |
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| अनुवाद |
| तत्पश्चात् गरुड़ ने दुःखी और दीन ऋषि गालव से कहा - "हे ब्राह्मणश्रेष्ठ गालव! आओ, हम विश्वामित्र ने मुझसे जो कहा है, उस पर चर्चा करें। आपको अपने गुरु का सारा धन चुकाए बिना चुप नहीं रहना चाहिए।" |
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| Thereafter Garuda said to the sad and downtrodden sage Galav - 'O best of the Brahmins, Galav! Come, let us discuss about what Vishwamitra has said to me. You should not keep quiet without paying back all the money owed to your Guru.' |
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इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि गालवचरिते त्रयोदशाधिकशततमोऽध्याय:॥ ११३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें गालवचरित्रविषयक एक सौ तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ११३॥
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