श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 113: ऋषभ पर्वतके शिखरपर महर्षि गालव और गरुड़की तपस्विनी शाण्डिलीसे भेंट तथा गरुड़ और गालवका गुरुदक्षिणा चुकानेके विषयमें परस्पर विचार  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  5.113.16 
तदायुष्मन् खगपते यथेष्टं गम्यतामित:।
न च ते गर्हणीयाहं गर्हितव्या: स्त्रिय: क्वचित्॥ १६॥
 
 
अनुवाद
अतः हे दीर्घायु पक्षीराज! अब तुम यहाँ से अपने इच्छित स्थान को जाओ। आज से तुम मेरी निन्दा न करो। मेरी ही नहीं, कहीं भी किसी स्त्री की निन्दा करना उचित नहीं है।॥16॥
 
‘Therefore, O long-lived bird king! Now you go to your desired place from here. From today onwards you should not criticise me. Why only me, it is not right to criticise any woman anywhere.॥ 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)