श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 113: ऋषभ पर्वतके शिखरपर महर्षि गालव और गरुड़की तपस्विनी शाण्डिलीसे भेंट तथा गरुड़ और गालवका गुरुदक्षिणा चुकानेके विषयमें परस्पर विचार  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  5.113.13 
निन्दितास्मि त्वया वत्स न च निन्दां क्षमाम्यहम्।
लोकेभ्य: सपदि भ्रश्येद् यो मां निन्देत पापकृत्॥ १३॥
 
 
अनुवाद
‘बेटा! तूने मेरी निन्दा की है, मैं निन्दा सहन नहीं करता। जो पापी मेरी निन्दा करता है, वह तुरन्त पुण्य लोकों से निष्कासित कर दिया जाता है॥13॥
 
‘Son! You have slandered me, I do not tolerate slander. The sinner who slanders me will immediately be expelled from the virtuous worlds.॥ 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)