श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 113: ऋषभ पर्वतके शिखरपर महर्षि गालव और गरुड़की तपस्विनी शाण्डिलीसे भेंट तथा गरुड़ और गालवका गुरुदक्षिणा चुकानेके विषयमें परस्पर विचार  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  5.113.11 
तदेवं बहुमानात् ते मयेहानीप्सितं कृतम्।
सुकृतं दुष्कृतं वा त्वं माहात्म्यात् क्षन्तुमर्हसि॥ ११॥
 
 
अनुवाद
आपके प्रति मेरे विशेष आदर के कारण ही मैंने इस स्थान पर कुछ ऐसा विचार किया है, जो कदाचित् आप नहीं चाहते थे। चाहे यह मेरा अच्छा कार्य हो या बुरा, आप अपने प्रताप से मेरे इस अपराध को क्षमा करें।॥11॥
 
It is because of my special respect for you that I have thought of something at this place, which perhaps you did not want. Whether this was a good deed or a bad deed done by me, please forgive this crime of mine by your greatness.'॥ 11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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