श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 113: ऋषभ पर्वतके शिखरपर महर्षि गालव और गरुड़की तपस्विनी शाण्डिलीसे भेंट तथा गरुड़ और गालवका गुरुदक्षिणा चुकानेके विषयमें परस्पर विचार  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  5.113.10 
सोऽहं भगवतीं याचे प्रणत: प्रियकाम्यया।
मयैतन्नाम प्रध्यातं मनसा शोचता किल॥ १०॥
 
 
अनुवाद
अतः मैं भगवती शाण्डिली के चरणों में गिरकर प्रार्थना करता हूँ कि मैंने आपको प्रसन्न करने की इच्छा से मननशील होकर यह विचार किया है।॥10॥
 
‘Therefore I fall at the feet of Bhagwati Shandili and pray that I have thought of this with my contemplative mind with the desire to please you.॥ 10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)