श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 112: गरुड़की पीठपर बैठकर पूर्व दिशाकी ओर जाते हुए गालवका उनके वेगसे व्याकुल होना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  5.112.7 
ससागरवनामुर्वीं सशैलवनकाननाम्।
आकर्षन्निव चाभासि पक्षवातेन खेचर॥ ७॥
 
 
अनुवाद
हे आकाश में उड़ते हुए गरुड़! अपने पंखों के बल से उत्पन्न वायु से आप समुद्र, पर्वत, वन और वन्य क्षेत्रों सहित सम्पूर्ण पृथ्वी को अपनी ओर खींचते हुए प्रतीत होते हैं।
 
O flying Garuda in the sky! With the wind generated by the force of your wings you seem to be pulling towards you the entire earth, including the ocean waters, mountains, forests and jungles. 7.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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