श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 112: गरुड़की पीठपर बैठकर पूर्व दिशाकी ओर जाते हुए गालवका उनके वेगसे व्याकुल होना  »  श्लोक 2-3
 
 
श्लोक  5.112.2-3 
पूर्वमेतां दिशं गच्छ या पूर्वं परिकीर्तिता।
देवतानां हि सांनिध्यमत्र कीर्तितवानसि॥ २॥
अत्र सत्यं च धर्मश्च त्वया सम्यक् प्रकीर्तित:।
इच्छेयं तु समागन्तुं समस्तैर्दैवतैरहम्।
भूयश्च तान् सुरान् द्रष्टुमिच्छेयमरुणानुज॥ ३॥
 
 
अनुवाद
सबसे पहले उस दिशा की ओर जाओ जिसका वर्णन तुमने पहले किया है; क्योंकि उस दिशा में तुमने देवताओं की निकटता बताई है और वहाँ सत्य और धर्म के अस्तित्व का भी भली-भाँति वर्णन किया है। हे अरुण के छोटे भाई गरुड़! मैं सभी देवताओं से मिलकर उन सबको पुनः देखना चाहता हूँ।
 
First of all, go towards the direction which you have described first; because in that direction you have told about the proximity of the gods and you have also explained the existence of truth and religion there very well. O Garuda, the younger brother of Arun! I want to meet all the gods and see them all again.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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