श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 112: गरुड़की पीठपर बैठकर पूर्व दिशाकी ओर जाते हुए गालवका उनके वेगसे व्याकुल होना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  5.112.18 
नैव मेऽस्ति धनं किंचिन्न धनेनान्वित: सुहृत्।
न चार्थेनापि महता शक्यमेतद् व्यपोहितुम्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
मेरे पास न तो धन है, न ही मेरा कोई धनवान मित्र है और यह कार्य ऐसा है कि बहुत सारा धन खर्च करने पर भी पूरा नहीं हो सकता ॥18॥
 
I do not have any money, nor do I have any rich friends, and this task is such that it cannot be accomplished even if a large sum of money is spent. ॥18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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