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श्लोक 5.112.18  |
नैव मेऽस्ति धनं किंचिन्न धनेनान्वित: सुहृत्।
न चार्थेनापि महता शक्यमेतद् व्यपोहितुम्॥ १८॥ |
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| अनुवाद |
| मेरे पास न तो धन है, न ही मेरा कोई धनवान मित्र है और यह कार्य ऐसा है कि बहुत सारा धन खर्च करने पर भी पूरा नहीं हो सकता ॥18॥ |
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| I do not have any money, nor do I have any rich friends, and this task is such that it cannot be accomplished even if a large sum of money is spent. ॥18॥ |
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