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श्लोक 5.112.15  |
न मे प्रयोजनं किंचिद् गमने पन्नगाशन।
संनिवर्त महाभाग न वेगं विषहामि ते॥ १५॥ |
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| अनुवाद |
| गरुड़! इस यात्रा में मेरा कोई उपयोग नहीं है, अतः लौट जाओ। हे महाभाग! मैं तुम्हारा वेग सहन नहीं कर सकता। |
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| Garuda! I have no use in this journey, so return. O great one! I cannot bear your speed. 15. |
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