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श्लोक 5.112.14  |
स मे निर्वाप्य सहसा चक्षुषी शाम्य ते पुन:।
तन्नियच्छ महावेगं गमने विनतात्मज॥ १४॥ |
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| अनुवाद |
| हे विनतनपुत्र! तुम उस अग्नि को सहसा बुझा दो और फिर अपने नेत्रों को शान्त कर दो तथा अपनी गति में महान वेग को रोक दो॥14॥ |
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| O son of Vinatan! You extinguish that fire suddenly and then calm your eyes and stop the great speed in your movement. ॥ 14॥ |
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