श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 112: गरुड़की पीठपर बैठकर पूर्व दिशाकी ओर जाते हुए गालवका उनके वेगसे व्याकुल होना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  5.112.14 
स मे निर्वाप्य सहसा चक्षुषी शाम्य ते पुन:।
तन्नियच्छ महावेगं गमने विनतात्मज॥ १४॥
 
 
अनुवाद
हे विनतनपुत्र! तुम उस अग्नि को सहसा बुझा दो और फिर अपने नेत्रों को शान्त कर दो तथा अपनी गति में महान वेग को रोक दो॥14॥
 
O son of Vinatan! You extinguish that fire suddenly and then calm your eyes and stop the great speed in your movement. ॥ 14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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