श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 112: गरुड़की पीठपर बैठकर पूर्व दिशाकी ओर जाते हुए गालवका उनके वेगसे व्याकुल होना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  5.112.1 
गालव उवाच
गरुत्मन् भुजगेन्द्रारे सुपर्ण विनतात्मज।
नय मां तार्क्ष्य पूर्वेण यत्र धर्मस्य चक्षुषी॥ १॥
 
 
अनुवाद
गालवन ने कहा - गरुत्मान! भुजगराजशत्रो! सुपर्ण! विनतानंदन! तार्क्ष्य! आप मुझे पूर्व दिशा की ओर ले चलें, जहाँ सूर्य और चन्द्रमा धर्म के नेत्रों के समान चमकते हैं॥1॥
 
Galavan said – Garutman! Bhujgarajshatro! Suparn! Vintanandan! Tarkshya! You take me towards the east, where the sun and the moon shine as the eyes of religion. 1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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