श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 110: पश्चिमदिशाका वर्णन  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  5.110.6 
अत्र सूर्यं प्रणयिनं प्रतिगृह्णाति पर्वत:।
अस्तो नाम यत: संध्या पश्चिमा प्रतिसर्पति॥ ६॥
 
 
अनुवाद
इसी दिशा में क्षितिज है, जो प्रतिदिन अपने प्रिय सूर्यदेव को प्राप्त करता है। यहीं से पश्चिमी संध्या का विस्तार होता है॥6॥
 
In this direction is the horizon, which receives its beloved Sun God every day. It is from here that the western evening spreads.॥ 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)