श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 110: पश्चिमदिशाका वर्णन  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  5.110.14 
अत्र वायुस्तथा वह्निराप: खं चापि गालव।
आह्निकं चैव नैशं च दु:खं स्पर्शं विमुञ्चति॥ १४॥
 
 
अनुवाद
गालव! वायु, अग्नि, जल और आकाश - ये सब इस दिशा में रात्रि और दिन का कष्टदायक स्पर्श त्याग देते हैं (अर्थात् यहाँ इनका स्पर्श सदैव सुखदायी होता है)। 14॥
 
Galav! Air, fire, water and sky - all of them in this direction give up the painful touch of night and day (that is, here their touch is always pleasant). 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)