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श्री महाभारत
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पर्व 5: उद्योग पर्व
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अध्याय 110: पश्चिमदिशाका वर्णन
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श्लोक 1
श्लोक
5.110.1
सुपर्ण उवाच
इयं दिग् दयिता राज्ञो वरुणस्य तु गोपते:।
सदा सलिलराजस्य प्रतिष्ठा चादिरेव च॥ १॥
अनुवाद
गरुड़ कहते हैं - गालव! यह आगे की दिशा जल के स्वामी दिक्पाल राजा वरुण को सदैव अत्यंत प्रिय है। यही उनका आश्रय और उत्पत्ति स्थान है॥1॥
Garuda says - Galav! This direction in front is always very dear to the lord of water, Dikpal King Varun. This is his refuge and place of origin.॥ 1॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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