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mahabharat 5.108.11: द्विजश्रेष्ठ! इसी दिशा में सूर्यदेव ने महर्षि याज्ञवल्क्य को शुक्लयजुर्वेद के मन्त्र दिए थे और इसी दिशा में देवता यज्ञों में सोमरस का पान करते हैं, जो उन्हें वरदान स्वरूप प्राप्त हुआ है। 11॥   |   mahabharat अध्याय 5.108: गरुड़का गालवसे पूर्व दिशाका वर्णन करना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 108: गरुड़का गालवसे पूर्व दिशाका वर्णन करना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  5.108.11 
अत्र दत्तानि सूर्येण यजूंषि द्विजसत्तम।
अत्र लब्धवर: सोम: सुरै: क्रतुषु पीयते॥ ११॥
 
 
अनुवाद
द्विजश्रेष्ठ! इसी दिशा में सूर्यदेव ने महर्षि याज्ञवल्क्य को शुक्लयजुर्वेद के मन्त्र दिए थे और इसी दिशा में देवता यज्ञों में सोमरस का पान करते हैं, जो उन्हें वरदान स्वरूप प्राप्त हुआ है। 11॥
 
Dwijshreshtha! In this direction, the Sun God had given the mantras of Shuklayajurveda to Maharishi Yajnavalkya and in this direction, the gods drink the Somras in the yagyas, which they have received as a boon. 11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)