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mahabharat 5.107.17: गालव! तुम मेरे प्रिय मित्र हो और मेरे मित्रों के भी प्रिय मित्र हो। शुभचिंतकों का कर्तव्य है कि यदि उनके पास धन-सम्पदा हो, तो वे उसका उपयोग अपने शुभचिंतकों की मनोवांछित कामनाओं की पूर्ति के लिए करें। 17॥   |   mahabharat अध्याय 5.107: गालवकी चिन्ता और गरुड़का आकर उन्हें आश्वासन देना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 107: गालवकी चिन्ता और गरुड़का आकर उन्हें आश्वासन देना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  5.107.17 
सुहृद् भवान् मम मत: सुहृदां च मत: सुहृत्।
ईप्सितेनाभिलाषेण योक्तव्यो विभवे सति॥ १७॥
 
 
अनुवाद
गालव! तुम मेरे प्रिय मित्र हो और मेरे मित्रों के भी प्रिय मित्र हो। शुभचिंतकों का कर्तव्य है कि यदि उनके पास धन-सम्पदा हो, तो वे उसका उपयोग अपने शुभचिंतकों की मनोवांछित कामनाओं की पूर्ति के लिए करें। 17॥
 
Galav! You are my dear friend and also the dear friend of my friends. It is the duty of the well-wishers that if they have wealth and prosperity, they should use it to fulfill the desired wishes of their well-wishers. 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)