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mahabharat 5.107.11: दरिद्र और पापी मनुष्य का जीवन वास्तव में जीवन नहीं है। पापी मनुष्य अपने परिवार का पालन-पोषण कैसे कर सकता है? पापी (दरिद्र) मनुष्य अपने पुण्य कर्मों का नाश करके स्वयं भी नष्ट हो जाता है॥ 11॥   |   mahabharat अध्याय 5.107: गालवकी चिन्ता और गरुड़का आकर उन्हें आश्वासन देना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 107: गालवकी चिन्ता और गरुड़का आकर उन्हें आश्वासन देना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  5.107.11 
न जीवत्यधन: पाप: कुत: पापस्य तन्त्रणम्।
पापो ध्रुवमवाप्नोति विनाशं नाशयन् कृतम्॥ ११॥
 
 
अनुवाद
दरिद्र और पापी मनुष्य का जीवन वास्तव में जीवन नहीं है। पापी मनुष्य अपने परिवार का पालन-पोषण कैसे कर सकता है? पापी (दरिद्र) मनुष्य अपने पुण्य कर्मों का नाश करके स्वयं भी नष्ट हो जाता है॥ 11॥
 
‘The life of a poor and sinful man is not really life. How can a sinful man support his family? A sinful (poor) man, destroying his good deeds, is sure to perish himself.॥ 11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)