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mahabharat 5.106.25: उसके द्वारा बार-बार 'जाओ, जाओ' कहने पर भी गालवन ने कई बार आग्रहपूर्वक पूछा, 'मैं तुम्हें क्या गुरुदक्षिणा दूँ?'॥ 25॥   |   mahabharat अध्याय 5.106: नारदजीका दुर्योधनको समझाते हुए धर्मराजके द्वारा विश्वामित्रजीकी परीक्षा तथा गालवके विश्वामित्रसे गुरुदक्षिणा माँगनेके लिये हठका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 106: नारदजीका दुर्योधनको समझाते हुए धर्मराजके द्वारा विश्वामित्रजीकी परीक्षा तथा गालवके विश्वामित्रसे गुरुदक्षिणा माँगनेके लिये हठका वर्णन  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  5.106.25 
असकृद् गच्छ गच्छेति विश्वामित्रेण भाषित:।
किं ददानीति बहुशो गालव: प्रत्यभाषत॥ २५॥
 
 
अनुवाद
उसके द्वारा बार-बार 'जाओ, जाओ' कहने पर भी गालवन ने कई बार आग्रहपूर्वक पूछा, 'मैं तुम्हें क्या गुरुदक्षिणा दूँ?'॥ 25॥
 
Despite being repeatedly ordered to 'go, go' by him, Galavan asked several times with insistence, 'What gurudakshina should I give you?'॥ 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)